दारा सिंह की रिहाई को लेकर फिर चर्चा में आया पुराना मामला
करीब ढाई दशक पहले ओडिशा के मयूरभंज जिले में हुए ग्राहम स्टेन्स हत्याकांड का मामला एक बार फिर चर्चा में है। इसकी वजह दारा सिंह उर्फ रविंद्र पाल सिंह की प्रस्तावित रिहाई को लेकर सामने आई न्यायिक प्रक्रिया है।
सामाजिक कार्यकर्त्री प्रिय मुंडा ने एक पत्रकार से बातचीत में दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने दारा सिंह की रिहाई का मार्ग प्रशस्त किया है और निर्धारित प्रक्रिया पूरी होने के बाद उनकी रिहाई संभव है।
ग्राहम स्टेन्स हत्याकांड क्या था?
जनवरी 1999 में ऑस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स और उनके दो नाबालिग पुत्रों की ओडिशा के मनोहरपुर में जलाकर हत्या कर दी गई थी। यह मामला राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना था।
बाद में न्यायिक प्रक्रिया के दौरान दारा सिंह को इस मामले में दोषी ठहराया गया। प्रारंभिक मृत्युदंड को बाद में आजीवन कारावास में परिवर्तित कर दिया गया था।
प्रिय मुंडा ने क्या कहा?
बातचीत के दौरान प्रिय मुंडा ने दावा किया कि दारा सिंह को इस मामले में गलत तरीके से फंसाया गया और घटना के समय उनकी घटनास्थल पर मौजूदगी को लेकर गंभीर प्रश्न हैं।
उनके अनुसार,
- दारा सिंह सामाजिक कार्यों और कथित धर्मांतरण विरोधी गतिविधियों से जुड़े थे।
- उन्हें मुख्य अभियुक्त बनाए जाने के पीछे व्यापक साजिश थी।
- मामले की निष्पक्ष जांच नहीं हुई।
- कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया।
इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि इस बातचीत में प्रस्तुत नहीं की गई।
धर्मांतरण को लेकर भी लगाए गंभीर आरोप
प्रिय मुंडा ने बातचीत में ग्राहम स्टेन्स के कार्यों को लेकर भी कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि आदिवासी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कराया जा रहा था तथा स्थानीय समाज में असंतोष बढ़ रहा था।
दारा सिंह के समर्थन में चलाए अभियान का उल्लेख
प्रिय मुंडा ने बताया कि वर्ष 2019 से उन्होंने दारा सिंह के मामले को लेकर सक्रिय प्रयास शुरू किए। उनके अनुसार उन्होंने जेल में मुलाकात की, कानूनी सहायता उपलब्ध कराने का प्रयास किया तथा विभिन्न संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों तक अपनी बात पहुँचाई।
उन्होंने यह भी दावा किया कि इस अभियान के दौरान उन्हें स्वयं भी कानूनी और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा।
संगठनों की भूमिका पर भी उठाए सवाल
बातचीत के दौरान प्रिय मुंडा ने कुछ हिंदू संगठनों की भूमिका पर भी प्रश्न उठाए। उनका दावा था कि जिन संगठनों से दारा सिंह जुड़े रहे, उन्होंने लंबे समय तक उनके परिवार या कानूनी संघर्ष में अपेक्षित सहयोग नहीं दिया।